अल्‍मोड़ा सुदूर गांव में बंगलुरु की बेटी ने शुरू किया पहाड़ की वनस्पतियों का कारोबार, करोड़ों का हुआ बिजनेस

अल्मोड़ा उत्तराखंड

अल्मोड़ा। ऑर्गेनिक फार्मिंग की संस्थापक अमृता चैंगप्पा उत्‍तराखंड के सुदूरवर्ती गांव से देश-दुनिया को हर्बल उत्‍पादों की सप्‍लाई कर रही हैं। करीब 13 साल पहले अमृता ने अल्मोड़ा जिले के ऐसे गांव में महिला सशक्तिकरण की नींव रखी जो प्राकृतिक रूप से तो बेहद समृद्ध है, लेकिन यहां के मिट्टी की कीमत लोग समझ नहीं सके थे। अमृता ने इसकी वजह जानने के लिए गहन अध्ययन किया और फिर जो इको विलेज मॉडल का सपना बुना वह तरक्‍की का गवाह बना। वह अब स्‍थानीय महिलाओं के साथ मिलकर आसपास की वनस्पतियों से हर्बल उत्पाद तैयार कर देश-विदेश तक पहुंचा रही हैं। पहाड़ी जैविक उत्पादों के बूते अमृता का स्टार्टअप एक करोड़ रुपए का टर्नओवर देने लगा है।

बंगलुरु में पली बढ़ी अमृता चैंगप्पा कोडीकनाल इंटरनेशनल स्कूल की मेधावी छात्रा रही हैं। वह जैविक खेती व उत्पादों की शौकीन रहीं। लखनऊ (उप्र) में बसने के बाद ऑर्गेनिक फार्मिंग यूनिट की संस्थापक बनीं। इसी दरमियान दार्शनिक ओशो से प्रभावित होकर उनकी अनुयायी बन गईं। तीस साल पहले उन्होंने जर्मन मूल के साथी संग विवाह किया। हिमालय, यहां के अध्यात्म व नैसर्गिक सुंदरता की कायल अमृता के मन में पहाड़ पर बसने की धुन सवार हो गई।

लंबा अध्ययन और मिथक तोड़ने की धुन

बसने से पहले अमृता व उनके पति संतोष ने पहाड़ का भूगोल जाना। विषम भौगोलिक परिस्थितियां, चौतरफा चुनौतियां, खेती के तौर-तरीके, पलायन आदि सभी विषयों की थाह ली। निचोड़ निकाला कि पहाड़ में रहकर बहुत कुछ किया जा सकता है। खेती को संवार गुमनाम होती जा रही वनस्पतियों व उनसे तैयार होने वाले उत्पादों की ब्रांडिंग कर स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। अमृता कहती हैं कि जब उन्होंने स्थानीय लोगों से इन सभी बिंदुओं पर चर्चा कर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहा तो उन्हें यही जवाब मिला कि- गांवों में कुछ नहीं हो सकता। तब उन्होंने कुछ करने की ठानी और सीढ़ियां चढ़ती गईं।

सात महिला कर्मचारी, सौ से ज्यादा प्रशिक्षित

वर्ष 2008 में अमृता अपने पति संतोष के साथ चितई पंत गांव में बस गईं। एक यूनिट खोली। एसओएस के नाम से कंपनी बनाई। स्थानीय पारंपरिक उत्पाद मडवा, मादिरा, झुंगरा, कौंणी आदि का संग्रहण शुरू किया। महिलाओं को अपने खेतों में इन फसलों को उगाने का कहा। उनकी मुहिम रंग लाई और महिलाएं अमृता के साथ कंधे से कंधा मिला आगे बढ़ने लगीं। बकौल अमृता, उन्होंने महिलाओं के कौशल विकास पर फोकस किया। आज सात महिला कर्मचारी उनके पास स्थायी रोजगार पा चुकी हैं। सौ से ज्यादा लड़कियां व महिलाएं प्रशिक्षण पाकर आत्मनिर्भर होकर घर चला रहीं। वहीं करीब 15 महिलाएं यूनिट में काम कर आजीविका चला रहीं।

जैविक क्रीम समेत 40 उत्पाद संवार रहे ग्रामीणों की तकदीर

अमृता की यूनिट में जैविक साबुन समेत करीब 40 उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं । खास बात कि रसायनमुक्त और प्राकृतिक उत्पाद होने के कारण राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत भी अच्छी मिलने लगी है। प्राकृतिक साबुन दो माह में तैयार होता है। नारियल, पाम व च्यूरा के तेल से कई तरह के साबुन बनाए जा रहे। वहीं इन्हें रंगने के लिए स्थानीय वनस्पतियों का इस्तेमल किया जाता है। मसलन साबुन को हरा रंग देने को बिच्छू घास, पीले के लिए हल्दी का उपयोग होता है। हर्बल साबुन 170 से 250 रुपये तक बिक रहा है। बिच्छू घास की 50 ग्राम चाय 150 रुपये में।

यह ऑलाइन बिक्री

उत्तर प्रदेश, मुंबई, दिल्ली समेत सभी राज्यों में अमृता के जैविक उत्पाद पहचान बना चुके हैं। करीब तीस उत्पाद ऑनलाइन बिक्री की जा रही है। जापान, इंग्लैंड आदि देशों को भी जैविक उत्पाद ऑनलाइन बेच रही हैं। सौंदर्य प्रसाधन की क्रीम 360 से 620 रुपये तक बिक रही हैं। इसी तरह पहाड़ का पुराना पौष्टिक लाल चावल 220 रुपये प्रति किलो तक खरीदा जा रहा।

 

वर्षाजल बचाने को 80 हजार लीटर का इकोइक फ्रेंडली टैंक भी बनाया

पहाड़ी जैविक उत्पादों को देश-विदेश तक बेच रहीं अमृता जलमित्र भी हैं। उन्होंने अपने आवास व यूनिट में वॉटर हार्वेस्टिंग का जाल तैयार किया है। पास ही खेत में 80 हजार लीटर क्षमता का इको फ्रेंडली वॅटर टैंक बनाया है। अमृता के अनुसार उन्होंने पेयजल कनेक्शन लिया ही नहीं है। वह अन्य ग्रामीणों व चितई बाजार के होटल स्वामियों को भी वर्षा जल एकत्र कर पानी बचाने को प्रेरित कर रहीं हैं।

कोरोना के कारण व्यवसाय प्रभावित हुआ

अमृता चैंगप्पा बताती हैं कि ऐसा नहीं है कि पहाड़ में कुछ हो नहीं सकता। इच्छाशक्ति की जरूरत है और यही यहां की महिलाएं दिखा रही हैं। मैंने हिमालय दर्शन के साथ यहां बसकर महिला सशक्तीकरण व उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की जो योजना बनाई थी सफल हो रही है। इन तेरह वर्षों में परिणाम अच्छे मिले हैं। पहाड़ की फसलें ही नहीं मानव मित्र तमाम वनस्पतियां हैं जिनका वैज्ञानिक दोहन कर उत्पाद बनाए जा सकते हैं। हम वही कर रहे हैं। कोरोना के कारण व्यवसाय में प्रभाव पड़ा है। वैश्विक महामारी से जंग जीतने के बाद मुहिम को और आगे ले जाएंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *